मानवीय भावनाओं का अनूठा संगीतमय चित्रण—कोरस का वार्षिक ‘नवरस’ कार्यक्रम

0
226

द कोरस का वार्षिक संगीत कार्यक्रम नवरस संगीत की स्वर लहरियों में दिखी मानवीय भावनाओं की अनूठी झलक

प्रयागराज। सांस्कृतिक केन्द्र प्रेक्षागृह में कल सायं आयोजित नवरस” कार्यक्रम में कोरस संस्था के कलाकारों ने मानवीय जीवन में अनुभव किये जाने वाले विभिन्न भावों को अपने मधुर गीतों की प्रस्तुति से जीवंत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

अवसर था संगीत संस्था “कोरस” का वार्षिक कार्यक्रम जिसमें हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी एक अनूठी थीम रखी गई थी-मानवीय जीवन में अनुभव किये जाने वाले नौ रसों की सांगीतिक प्रस्तुति। कार्यक्रम में सभी नौ रसों जैसे श्रृंगार-रस, हास्य-रस, करूण-रस, भयानक-रस, वीर-रस, रौद्र-रस, वीभत्स रस, अद्भुत-रस एवं शांत-रस जो मनुष्य विभिन्न परिस्थितियों में महसूस करता है, को फिल्मी गीतों के माध्यम से दर्शाया गया।

“कोरस” संस्था के इस अनूठे कार्यक्रम की परिकल्पना करने वाले कोरस के संस्थापक व नगर के जाने माने आर्किटेक्ट श्री पीयूष टंडन ने बताया कि “नव रसों” को नृत्य अथवा अभिनय के माध्यम से दिखाने की परंपरा तो सर्वविदित है जिसमें कलाकार चेहरे व अंगों के इस्तेमाल से सारी भाव भंगिमायें प्रस्तुत करते हैं, परंतु संगीत के माध्यम से उन भावों को प्रकट करना सर्वथा भिन्न होता है, क्योंकि संगीत में छिपे भावों का अनुभव सिर्फ स्वरों को सुनकर किया जा सकता है। इसी विशेषता को ध्यान में रखते हुये कार्यक्रम की परिकल्पना की गई। “कोरस” के सभी सदस्य अव्यावसायिक हैं और संगीत की प्यास बुझाने के लिये ही संस्था से जुड़े हैं। उन्हें मंच प्रदान कर उनकी प्रतिभा को संगीत प्रेमियों तक लाना ही संस्था का प्रमुख उद्देश्य है। कार्यक्रम का शुभारंभ आमंत्रित विशिष्ट दर्शकों द्वारा द्वीप प्रज्जवलन से किया गया। तदुपरांत संस्था के प्रमुख सलाहकार श्री विनय टंडन ने सभी अतिथियों का स्वागत किया व रश्मि गोडबोले ने सदस्यों का परिचय कराया। तपश्चात रुचि दुबे ने आगे के कार्यक्रम का संचालन किया।

संगीत-सरिता का प्रवाह आरंभ हुआ, एक मैडले द्वारा जिसमें सभी नौ भावों को एक-एक कलाकार द्वारा बारी बारी से गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। तत्पश्चात प्रत्येक भाव पर केंद्रित सोलो व डुयेट गीतों की प्रस्तुति का क्रम आरंभ हुआ।

सर्वप्रथम “श्रंगार – रस” से प्रेरित गीत ” बड़या ना धरो बलमा पर लता माहेश्वरी ने श्रोताओं को भाव विभोर किया। श्रंगार रस पर ही राजेश श्रीवास्तव ने फिल्म सरस्वतीचंद्र के सुप्रसिद्ध गीत” चंदन सा बदन चंचल चितवन” की भावपूर्ण प्रस्तुति से तालियां बटोरीं। अगली पेशकश कंचन माहेश्वरी की रही, जिन्होंने “दिल दीवाना बिन सजना के” गाकर समा बांधा। श्रंगार रस की अगली प्रस्तुति नीरु गुलाटी व सुलभ के द्वारा पेश किया गया युगल गीत ” बेखुदी में सनम उठ गये जो कदम” थी। हास्य रस पर हर्ष टंडन के फिल्म शागिर्द के मस्त गीत “बड़े मियां दीवाने, ऐसे न बनो” ने श्रोताओं को आनंदित कर दिया। इसी क्रम में शैलेन्द्र प्रताप सिंह ने “मेरा जूता है जापानी, रश्मि गोडबोले ने “झुमका गिरा रे” तथा आशुतोष व कंचन ने “जाने कहां मेरा जिगर गया जी” गाकर समां बांध दिया।

करूण-रस का प्रथम गीत था अर्चना त्रिपाठी की आवाज में “हम थे जिनके सहारे” जिसे उन्होंन बखूबी निभाया। तत्पश्चात कल्पना टंडन ने अपनी सुरीली प्रस्तुति ” रैना बीती जाये, श्याम ना आये” से जो करूणा का माहौल बनाया उसे ज्योति दुबे ने” तुझसे नाराज नहीं ज़िदगी हैरान हूं तथा राजेश श्रीवास्तव व लता माहेश्वरी ने “ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं हम क्या करें” से और खूबसूरत बना दिया।

कार्यक्रम की अगली कड़ी रौद्र रस के गीतों की प्रस्तुति रही जिसमें पीयूष टंडन ने फिल्म एक बार मुस्कुरा दो” के सुप्रसिद्ध गीत ” कितने अटल थे तेरे इरादे” की जानदार गायकी से दर्शकों को भाव विभोर कर दिया। नीलिमा सिंह ने जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं”, सुलभ ने “तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलती रही” व पीयूष-कल्पना द्वय ने जिसका मुझे था इंतज़ार” युगल गीत से रौद्र रस के विभिन्न रूपों हताशा, क्रोध इत्यादि का भरपूर आभास कराया।

वीर-रस की श्रेणी में संजीव त्रिपाठी ने “गुलाल” नामक एलबम के गीत आरंभहै प्रचंड” से जोश पैदा कर दिया। रुचि दुबे ने फिल्म चक दे इंडिया” के जोशीले गीत “बादल पे पांव है” को अपनी खनकती हुई आवाज़ में पेश किया जिसके बाद प्रवीन गोडबोले व रश्मि की जोड़ी ने “जिंदगी हर कदम एक नई जंग है” से पूरा वातावरण सगीतमय कर दिया।

भयानक रस को दर्शाने वाले गीतों की श्रंखला में पहला गीत फिल्म बीस साल बाद का कालजई गीत ” कहीं दीप जले कहीं दिल था जिसे स्वर दिया नीरू गुलाटी ने। जिसके पहले राज गुलाटी जी की आवाज़ में डरावने गीत का माहौल बनाया गया दूसरा गीत अमिताभ बच्चन की सुपर हिट फिल्म मुकद्दर का सिंकदर का ” ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना था जिसे आशुतोष माहेश्वरी ने कशिश के साथ गाकर तालियां बटोरी।

तदुपरांत वीभत्स रस अर्थात् घृणा, अवसाद आदि की भावनाओं से ओतप्रोत गीतों की प्रस्तुति के क्रम में जीतेन्द्र मालवीय ने “ये दुनिया ये महफिल”, शरद कक्कड ने “दोस्त दोस्त ना रहा” व संजीव-अर्चना ने “इक हसीना थी” की मनोहारी पेशकश से प्रेक्षागृह में मौजूद दर्शकों की वाह-वाही हासिल की।

संगीत संध्या की अगली पायदान पर अद्भुत रस से सराबोर ये क्या हुआ” फिल्म-अमर प्रेम, “क्यों चलती है पवन” फिल्म कहो ना प्यार है तथा “जिंदगी कैसी है पहेली हाय” फिल्म-आनंद रहे जिन्हें क्रमश तरूण नौलानी, प्रवीन व पीयूष टंडन ने एकाग्रता से गाकर श्रोताओं को एक अद्भुत अनुभूति का अनुभव कराया।।

“नवरस” के नौवें स्वरूप में शांत रस का भाव संजीव भार्गव ने सुरमई अंखियों में नन्हा सा इक सपना देखा है” (फिल्म सदमा) से बखूबी जगाया। शैलेन्द्र-नीलिमा ने दिल की गिरह खोल दो” से अपने दिल के शांत भाव की झलक दिखाई । कार्यक्रम की अंतिम पेशकश थी इसी रस पर आधारित रश्मि पटारिया का गीत ओ रे मनवा तू तो बावरा” जिसे फिल्म वेक अप सिड से लिया गया था !

“नवरस” कार्यक्रम का अंत पीयूष टंडन द्वारा सभी सहयोगियों को धन्यवाद ज्ञापन से हुआ। पूरे कार्यक्रम के दौरान उपस्थित दर्शकों की तालियों की करतल ध्वनि से न केवल सभी कलाकारों का उत्साह वर्धन हुआ बल्कि कार्यक्रम उपरांत दी गई उनकी प्रतिक्रियाओं से “कोरस” संस्था की इस संगीत संध्या की अपार सफलता का सहज ही अनुमान लगाया जा सका। शहर के गणमान्य न्यायाधीशों, चिकित्कों, अधिवक्ताओं, व्यवसायियों, संगीत प्रेमियों की उपस्थिति कार्यक्रम की अनूठी परिकल्पना व कार्यक्रम में संगीत संगत सत्य प्रकाश शर्मा ‘बबलू’ जी की थी। इस अवसर पर न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा, न्यायमूर्ति राजेश कुमार, न्यायमूर्ति अशोक कुमार, डॉ. प्रदीप सिन्हा, डॉ. एस.पी. मिश्रा, श्री प्रमोद बंसल व अन्य अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।