
प्रयागराजlहमारी लोक परम्परा और लोक संस्कृति के संवाहक हमारे लोकपर्व समाज में आपसी प्रेम सौहार्द को प्रगाढ़ करते हुए उल्लास पूर्ण वातावरण का निर्माण कर हमारे सांसारिक रिश्तों को तार-तार जोड़कर मानसिक ऊर्जा प्रदान करते हैं। विभिन्न उपक्रमों के साथ ऐसे पर्वों की मान्यताओं को पूरे रागरंग के साथ मनाने की जरूरत है। रक्षाबंधन पर्व पर यह बातें आकाशवाणी दूरदर्शन के कार्यक्रमों के संचालक,चर्चित हास्य कवि,लेखक और लोककलाकार ने कही। उन्होंने बताया कि वर्ष भर में अपनी पौराणिक मान्यताओं को लेकर कई लोकपर्वों के साथ साथ हमारे अतीत के स्वर्णिम इतिहास से जुड़े यही सामाजिक, राष्ट्रीय पर्व हमारे सामाजिक ढांचे को मजबूत करते हुए हमारी अपनी विरासत और पुरखों की परम्परा को सहेजते हैं। इन्हीं पर्वों ने हमारे सामाजिक तानेबाने को तारतार
जोड़कर बोध,उत्साह,उल्लास,नवलता,की
सर्जना को गतिमान रखा है। रक्षाबंधन पर्व जहां एक ओर भाई -बहन के पवित्र प्रेम के अनूठे बन्धन के रूप में लोकधर्मिता का संवाहक बनकर एक संकल्प और व्रत के साथ हमारे अपने रिश्ते को प्रगाढ़ बनाता है वहीं जीवन के नव उत्कर्ष को एक नये टाटकपन से भी जोड़ता है। वर्तमान बदलते दौर की तमाम विसंगतियों के बीच युवा पीढ़ी की मानसिकता को बहकावे से मोड़कर उनमें एक सभ्य,सांस्कारिक सोच पैदा करने के साथ,ऐसे पर्व और इनका चलन निश्चित ही एक नई सर्जना के साथ हमारे समाज को शिष्टाचार से जोड़ते हैं।
हमें चाहिए कि अपने ऐसे लोकपर्वों के गुरुत्व से जुड़,बिना किसी औपचारिकता,
लोभ,मोह,छोभ से दूर इसके महत्व और मान्यताओं को जी भर जिएं। क्यूंकि यही हमारे लोककथाओं में वर्णित महापुरुषों की प्रेरणादायक परिपाटी हैं,लोकजीवन की पूंजी हैं,अतीत की विरासत और अपनी सामाजिक मान्यताओं से सृजित हमारे पुरखों की थाती हैं।






















