नव दोहा कलश पर हुई परिचर्चा एवं बही काव्य की रसधार

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प्रयागराज। वैश्विक हिंदी महासभा के बैनर तले आज 9 सितम्बर 2024 दिन रविवार को राजरूपपुर, प्रयागराज में डाक्टर अजय मालवीय के आवास पर पंडित राकेश मालवीय मुस्कान की पुस्तक नव दोहा कलश पर एक परिचर्चा एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वैश्विक हिंदी महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉक्टर शम्भुनाथ त्रिपाठी अंशुल ने की। मुख्य अतिथि भगवान प्रसाद उपाध्याय, विशिष्ट अतिथि डॉक्टर योगेन्द्र कुमार मिश्र विश्वबंधु, मुक्तक सम्राट रामकैलाश पाल प्रयागी और प्रधानाचार्या वीबीपीएस प्रीति मिश्रा रही।
कार्यक्रम का आरम्भ अतिथियों ने माँ सरस्वती की प्रतिमा पर दीप प्रज्ज्वलित और माल्यार्पण करके किया। कार्यक्रम संचालक डॉक्टर अजय मालवीय ने मधुर वाणी में सरस्वती वंदना करके कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत की।
कार्यक्रम के आरम्भ विशिष्ट अतिथि रामकैलाश पाल प्रयागी ने कवि व दोहाकार पंडित राकेश मालवीय मुस्कान का सम्मान करते हुए उन्हें अंगवस्त्रम्, माल्यार्पण और पाँच हजार रुपए नकद प्रदान किए।
इस अवसर पर डॉक्टर अजय मालवीय ने नव दोहा कलश पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि पंडित राकेश मालवीय मुस्कान ने जिन चीजों को जैसा देखा, वैसा ही लिखने की कोशिश किया। इसलिए उनके दोहे सहज और स्वाभाविक हैं। मुस्कान की पुस्तक का आरंभ गणेश वंदना से हुआ है। इसमें कवि ने भक्ति, नीति, नारी, बेटी, भाषा, हास्य, राजनीति और लगभग सभी प्रकार के भावों को पिरोया है। एक दोहे में कवि कहता है:– “भेदभाव के खेल में, टूटे सब जज्बात।/अरे मनुज अब जाग तू, देख घनेरे घात।। उनकी यह पुस्तक सहज, सुपाठ्य और जीवन के तमाम संदर्भों को प्रेरित करती है।
इस अवसर पर प्रोफेसर रवि मिश्र ने कहा कि दोहे में केंद्रीय भाव भारतीयता है। गणेश वंदना के जीवन साधना को इसमें उद्धृत किया गया है। सामान्य दृष्टि से अध्यात्म दर्शन की ओर का सफर कराया गया है। सुकून वाला घर तक गायब है। जीवन के विविध रंग उभर कर आए हैं। सहमति और असहमति के दौर में अनेक विषय उठाए हैं।
डॉक्टर रामलखन चौरसिया वागीश ने कहा कि साहित्यकार का व्यक्तित्व, परिवेश और स्थिति के रूप में वह उसकी संतान के रूप उसके परवरिश को दिखाती है। कवि ने अपने भोगे हुए यथार्थ को पुस्तक में चित्रित किया है। कलश को भरने के लिए अभी बहुत जगह है।
मुख्य अतिथि भगवान प्रसाद उपाध्याय ने कहा कि मानवीय मूल्यों का समुचित प्रतिपादन किया गया है। दोहे संक्षेप में बहुत बड़ी बात कह जाते हैं।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉक्टर शम्भुनाथ त्रिपाठी अंशुल ने कहा कि दोहे की सार्थकता उसके कई तरह के प्रकार हो गए। रामचरितमानस भी जब लिखी गई थी तब उसे पता नहीं था कि कहा तक जाएगी। उसी तरह मुस्कान की नव दोहा कलश भी दूरगामी है।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें सुशान्त चट्टोपाध्याय, डॉक्टर इंदु जौनपुरी, सुनील विक्रम सिंह, शम्भुनाथ श्रीवास्तव, प्रोफेसर रवि मिश्र, डॉक्टर रामलखन चौरसिया, मुक्तक सम्राट रामकैलाश पाल प्रयागी, योगेन्द्र कुमार मिश्र विश्वबंधु, डॉक्टर भगवान प्रसाद उपाध्याय, डॉक्टर शम्भुनाथ त्रिपाठी अंशुल, डॉक्टर अजय मालवीय बहार इलाहाबादी, पंडित राकेश मालवीय मुस्कान, आदि ने बहुत सुंदर काव्य पाठ के साथ मंच को रोमांचित किया।
कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉक्टर अजय मालवीय बहार इलाहाबादी ने किया।