संपादकीय
नारी मन की कल्पकला का ,
कोई भी है मोल नहीं ।
प्रेम, दुलार, स्नेह और ममता ,
इसका कोई तोल नहीं ।
तो बात हो रही है महिला काव्य गोष्ठी विशेषांक की । हर रचनाकार की अपनी कला है । अपनी अभिव्यक्ति है, और अपना ही कल्प संसार है । गीत-गजल और कविता के माध्यम से अपने-अपने विचारों को संजो कर रखने वाली हर रचनाकार को मैं बधाई देता हूं । हर युग में नारी ने समाज का मान बढ़ाया है । चाहे वह सतयुग हो, त्रेता हो या द्वापर, नारी मन की अभिव्यक्ति और विचारों से भरा पूरा है । आईए देखते हैं इस विशेषांक में छपी हुई कुछ रचनाओं की बानगी
पहली बानगी
ना जीत चाहिए, ना हार चाहिए,
परमात्मा बस तेरा दीदार चाहिए
घिरे है आशा निराशा के घोर अंधेरों में,
लालच ,पिपासा और संदेह के घेरों में
तेरी ज्योति का , हर पल उजियार चाहिए ।
बस तेरा थोड़ा सा हमें प्यार चाहिए
दूसरी बानगी
यह सच है.. की खामोशियां भी बोलती हैं,
खामोशियां ..दिल के राज खोलती है।
बिन कहे.. नजरे भी बहुत कुछ बोलती है,
मन के भेदों को .. कमबख़्त खोलती हैं
तीसरी बानगी
हमारी हिंदी की महिमा बड़ी निराली है
बड़ी प्रभावी है बडे़ गुण वाली है!
यहां की बोलियों का दिल पे राज होता था!
अवधी ,ब्रज ,भोजपुरी, का रिवाज होता था!
महिला काव्य गोष्ठी विशेषांक का यह सफर चल रहा है और
चलता रहेगा । रचनाकार बेहतर से बेहतर रचना देती रहे और समाज इंसान को प्रफुलित करती रहे, यही मेरी कामना है। अंक कैसा लगा प्रतिक्रिया अवश्य दें ।
अंत में –
शब्द-शब्द लिख-लिख कर ,
बनाओ बिम्ब तुम ऐसा ।
जैसे लल्ला पालना में सोए ,
मां दुलाराऐ जैसा ।
उमेश श्रीवास्तव
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