सावन में काशी: जब आस्था, बारिश और बनारस एक हो जाते हैं

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विशेष फीचर—राजेश कुमार ओझा, वाराणसी

सावन का महीना शुरू होते ही काशी का स्वरूप बदल जाता है। गंगा के घाटों से लेकर विश्वनाथ धाम तक हर ओर हर-हर महादेव का उद्घोष सुनाई देता है। ऐसा लगता है मानो पूरा शहर भगवान शिव की आराधना में डूब गया हो। काशी केवल एक नगर नहीं रह जाती, बल्कि जीवंत आस्था का विराट उत्सव बन जाती है।
भोर की पहली किरण के साथ दशाश्वमेध, अस्सी और पंचगंगा घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। गंगा स्नान के बाद श्रद्धालु बेलपत्र, धतूरा, भांग और गंगाजल लेकर बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए निकलते हैं। सावन के प्रत्येक सोमवार को मंदिर परिसर और उससे जुड़ी गलियां श्रद्धालुओं के सैलाब से भर जाती हैं।

सावन का बनारस केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। यहां की गलियों में कजरी की मधुर धुनें गूंजती हैं। घरों और मंदिरों में झूले सजते हैं। बारिश से धुले पुराने मकान, भीगी हुई गलियां और गंगा के ऊपर तैरते बादल शहर को एक अद्भुत सौंदर्य प्रदान करते हैं। शाम की गंगा आरती में दीपों की लौ और बारिश की फुहारें मिलकर ऐसा दृश्य रचती हैं, जिसे शब्दों में बांधना कठिन है।

सावन स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण महीना है। फूल, प्रसाद, पूजा सामग्री, रुद्राक्ष, बेलपत्र, मिठाइयों और बनारसी वस्त्रों की बिक्री बढ़ जाती है। होटल, धर्मशालाएं, नाविक, ई-रिक्शा चालक और छोटे दुकानदारों की आमदनी में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है। धार्मिक पर्यटन का यह मौसम हजारों परिवारों के लिए रोजगार का अवसर लेकर आता है।
हालांकि श्रद्धा के इस महासागर के साथ कई चुनौतियां भी सामने आती हैं। भारी भीड़, लंबा जाम, पार्किंग की समस्या, सफाई व्यवस्था पर दबाव और सुरक्षा प्रबंधन प्रशासन के लिए बड़ी परीक्षा बन जाते हैं। बरसात के कारण फिसलन वाले घाट और जलभराव भी श्रद्धालुओं की परेशानी बढ़ाते हैं। प्रशासन, पुलिस और स्वयंसेवी संस्थाएं मिलकर व्यवस्थाओं को सुचारु बनाए रखने का प्रयास करती हैं।
सावन का बनारस यह भी याद दिलाता है कि आधुनिक विकास और प्राचीन परंपरा का संतुलन कितना आवश्यक है। करोड़ों लोगों की आस्था का सम्मान करते हुए शहर की सांस्कृतिक पहचान, घाटों की स्वच्छता और ऐतिहासिक विरासत का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।

सावन में काशी केवल देखी नहीं जाती, बल्कि महसूस की जाती है। यहां घंटियों की ध्वनि, गंगा की लहरें, भीगी हवाएं और “हर-हर महादेव” का जयघोष मिलकर ऐसा आध्यात्मिक वातावरण रचते हैं, जो हर आगंतुक के मन पर अमिट छाप छोड़ देता है। यही कारण है कि सावन का बनारस हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है और शिव की नगरी होने का अर्थ नए सिरे से समझाता है।

राजेश कुमार ओझा, वाराणसी

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