भारत ने UN में चीन-पाकिस्तान पर साधा निशाना, कहा- आतंकियों को बचाकर ‘हीरो’ बनाने का खेल बंद करो

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भारत ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता का इस्तेमाल आतंकवादियों को प्रतिबंध व्यवस्था से बाहर कराने की कोशिश कर उन्हें ”वैधता” प्रदान करने या केवल ”राजनीतिक विचारों” के आधार पर संस्थाओं को काली सूची में डालने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। भारत ने जोर देकर कहा कि 15 सदस्यीय इस शक्तिशाली निकाय को संकीर्ण हित साधने का मंच नहीं बनना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में प्रभारी राजदूत योजना पटेल ने सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली पर बुधवार को चर्चा के दौरान संस्था की प्रतिबंध व्यवस्थाओं के तहत आतंकवादियों और आतंकवादी संगठनों को काली सूची में डालने एवं सूची से हटाने की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता एवं निष्पक्षता की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा, ”सुरक्षा परिषद की सदस्यता के साथ महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं। इसे संकीर्ण राजनीतिक हित साधने का मंच नहीं बनना चाहिए।” पटेल ने कहा, ”सूचीबद्ध करना और सूची से हटाना इसका एक उदाहरण है। इस मामले में अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता होनी चाहिए। सुरक्षा परिषद में मौजूदगी का इस्तेमाल आतंकवादियों को सूची से हटाने का प्रयास कर उन्हें वैधता देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए और न ही इसका इस्तेमाल अन्य संस्थाओं को केवल राजनीतिक विचारों के आधार पर तथा किसी वस्तुनिष्ठ मानदंड के बिना या आवश्यक दस्तावेज मुहैया कराए बिना आतंकवादी संगठन घोषित करने के लिए किया जाना चाहिए।” भारत, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध समितियों में आतंकवादियों और आतंकवादी संगठनों को सूचीबद्ध करने के प्रस्तावों पर अपारदर्शी तरीके से लिए जाने वाले निर्णयों का लगातार विरोध करता रहा है।

नयी दिल्ली ने परिषद के सहायक निकायों की कार्यप्रणाली में भी अधिक पारदर्शिता की मांग की है। भारत का कहना है कि सूचीबद्ध करने से जुड़े फैसले सार्वजनिक किए जाते हैं, लेकिन प्रस्ताव खारिज किए जाने या उन्हें तकनीकी आधार पर रोक कर रखे जाने से जुड़ी जानकारी कुछ चुनिंदा सदस्यों तक ही सीमित रहती है। भारत ऐसी प्रक्रियाओं को ”छिपा हुआ वीटो” करार दे चुका है और विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रस्ताव संख्या 1267 के तहत गठित अल-कायदा प्रतिबंध समिति की कार्यप्रणाली को लेकर चिंता जता चुका है। भारत ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के दायरे में आने वाले आतंकवादियों को काली सूची में डालने के साक्ष्य-आधारित प्रस्तावों को पर्याप्त स्पष्टीकरण के बिना रोका नहीं जाना चाहिए।

उसका कहना है कि ऐसी प्रक्रियाएं आतंकवाद से मुकाबले की परिषद की घोषित प्रतिबद्धता को कमजोर करती हैं। भारत को पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों को सूचीबद्ध कराने के अपने प्रयासों में अतीत में ऐसी बाधाओं का सामना करना पड़ा है। सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य चीन ने कुछ प्रस्तावों पर रोक लगाई थी या उन्हें अवरुद्ध किया था। भारत ने प्रस्ताव संख्या 1267 के तहत गठित अल-कायदा और तालिबान प्रतिबंध समितियों समेत सुरक्षा परिषद के सहायक निकायों के अध्यक्षों के चयन में देरी पर भी चिंता जताई। इस साल के आठ महीने बीत जाने के बावजूद परिषद अब तक अपने सहायक निकायों के अध्यक्षों और उपाध्यक्षों के नाम तय नहीं कर पाई है। भारत ने इस पर तत्काल कार्रवाई की मांग की है। प

टेल ने कहा, ”सहायक निकाय महत्वपूर्ण काम करते हैं और सुरक्षा परिषद के आदेशों को बेहतर तरीके से लागू करने में मदद करते हैं। हालांकि, हाल के समय में ये निकाय अपना काम पूरी क्षमता से नहीं कर पाए हैं और इसका मुख्य कारण अध्यक्षों के नाम तय करने में हुई देरी है।” उन्होंने इस मुद्दे को प्राथमिकता के आधार पर हल करने और सहायक निकायों के अध्यक्षों के चयन के लिए एक ”निश्चित और गैर-समझौतावादी” समयसीमा तय करने का आह्वान किया। अगस्त महीने के लिए सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता कर रहे डेनमार्क ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में कहा कि परिषद के सहायक निकायों के अध्यक्षों की नियुक्ति में ”अप्रत्याशित देरी” से परिषद की ”प्रभावशीलता, विश्वसनीयता और संस्थागत अखंडता” कमजोर होती है।  

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