आज के बदलते परिवेश और आधुनिकता की चकाचौंध में कई विमर्श और परिदृश्य के नयेपन का विस्तार हो रहा है। हमारी सोच और चिंतन की परिधि,परिभाषा,
अवधारणा,उद्देश्य हमें बिस्तार कीओर
आकर्षित कर रहे हैं तो वहीं हमें विविधता से जोड़ते विविध माध्यमों में भी एक दूसरे से आगे जाने की होड़ लगी है। ऐसे में अतीत के कई मानकों की असल ज़मीन इस बनावटीपन के दायरे में खोने से बचाने की जरूरत है। जरुरत है अपने आदर्श लोकनाट्य’रामलीला’की उस लोक परम्परा को संजोए रखने की।
आज,जरूरत है,शहर नगर गांव गांव रामलीला की रंगमंचीय शैली का पुराना लोकरंग जीवन्त करने की। जरुरत है,मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के लोकोत्तर जीवन के चरित्र आदर्श मर्यादा के उस लोक स्वरुप
से जन-जन को जोड़ने की।
कुछ दशक पहले नवरात्रि के आरंभ होते ही गांव-गांव रामलीला मंचन की परंपरा अनवरत महीनों तक चलती थी।हमारे धर्म परायण समाज में जीवन मूल्य अनुप्रानित
करती रामलीला का लोकस्वरूप अतीत में मध्यकालगत सामन्तों,जमीदारों और अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित रहा ,लेकिन कालांतर में वह धीरे-धीरे जनमानस से जुड़ गया।दर्शन और पात्रों के बीच रामभक्ति की रंगमंचीय परंपरा रामलीला महोत्सव के रूप में प्रत्येक गांव की चौपाल से जुड़ी।रामलीला महोत्सव में लोग मात्र तमाशाबीन बन कर नहीं जाते थे। आयोजन को लेकर कलाकार और रंग शिल्पी सब के सब मंचन के भाव पक्ष की रोचकता पर विशेष ध्यान देते।कलाकारों का चयन साज,सज्जा,मुखौटे,
धनुष,बाण,मुकुट वेशभूषा,डोरी पर्दा,सहित आवश्यक सामग्री की व्यवस्था कमेटियों के द्वारा की जाती। भाव प्रधान इस लोकनाट्य की विविध प्रसंगों को रोचक बनाने के लिए वसुनायक,किंकर आदि रामायण,राधेश्याम रामायण जैसे कई रामायणों से कलाकारों हेतु विविध पाठों के चयन की परंपरा रही। इस धर्म प्रधान नाटक के माध्यम से प्रेक्षकों के हृदय में राजा,प्रजा गुरु,पिता,पति,भाई,
परिवार,समाज की प्रकृति और सत्य का एक दूसरे के प्रति आदर भाव प्रेम निष्ठा कर्तव्य जैसे आदर्श स्थापित करना ही मंचन का प्रमुख ध्येय था। रामलीला की अभिव्यक्ति में परिलक्षित प्रेम सत्य ज्ञान हमें लौकिक और अलौकिक जीवन के विविध रंगों से जोड़ता था।अभिनय करने वाले पात्र प्रमुख रूप से गांव के ही होते थे।जिन्हें कमेटियों द्वारा उनके कद, काठी,सुंदरता स्वर, क्षमता के अनुरूप निर्देशक और महंत द्वारा चयनित किया जाता था।महीना भर पहले पात्रों के पाठ और संवाद वितरित कर पखवारे भर पहले चौपाल में कलाकारों का रिहर्सल होता। उम्र दराज कई पुराने मशहूर लोक कलाकार नए कलाकारों को तालीम देते। बाहर नौकरी करने वाले कई कलाकार कुछ दिन की छुट्टी लेकर अपने गांव की रामलीला मेंअभिनय हेतु आ जाते थे।अपने गांव की रामलीला को बेहतर बनाने के लिए आपस में होड़ लग जाती।पहले दिन मुकुट पूजन से लेकर अनवरत 10 दिन तक विविध प्रसंगों से जुड़ी रामलीला के मंचन में भक्ति भाव के साथ ग्रामीणों की बड़ी भीड़ जुटती।बिना भेदभाव गांव की महिलाएं, बुजुर्ग,बच्चे और युवा जमीन पर बिछे बिछौने पर बैठ,देर रात तक रामलीला का लोकानन्द उठाते। अपने कुशल अभिनय को लेकर कई पात्र उसी नाम से मशहूर हो जाते और गांव के लोग इसी नाम से पुकारते । विशेष रूप से धनुष यज्ञ और लक्ष्मण शक्ति की रामलीला का विविधतापूर्ण,रोचक प्रसंग रामलीला मैदान में बड़ी भीड़ को आकर्षित करता। मंचन के उपरांत गांव के पास की सड़क या
बागों में दशहरा मेला का भव्य आयोजन होता।जहां बांस की फट्टियों से रावण का भव्य पुतला तैयार करने के बाद आकर्षक साज सज्जा में राक्षस दलऔर वानर दल की लड़ाई का रोमांचक दृश्य लोगों को भरपूर आकर्षित करता। मेले में तरह-तरह की गंवंई दुकानें सजती।खान-पान के बिविध सामान,
बांसुरी गुब्बारे और झूले बच्चे और आमलोगों
को लुभाते और दशहरा मेला समाप्त होते ही सभी लोग तरह तरह की सुधियों में खोये अगले बरस की प्रतीक्षा में रम जाते।
आज रील,फिल्म और परदे की चकाचौंध में शायद गंवंईं रामलीला का वह प्रत्यक्ष रूप गुम सा होता जा रहा है। दूसरी ओर गणेश उत्सव और दुर्गा पूजन की परंपरा के बढ़ते प्रभाव के साथ-साथ रामलीला मंचन के कार्यक्रमों में भी तेजी से कमी आई है।हो ना हो लोकनाट्य का वह रागरंग,आदर्श स्वरूप जो कभी गांव-गांव अनवरत 10 दिनों तक मंचन के माध्यम से पूरे समाज को प्रत्यक्ष रूप से आदर्श चरित्र मर्यादा समरसता के भाव प्रभाव और अपने अतीत की अनमोल विरासत से जोड़ता था वही लोक रंग पुनः स्थापित करने की जरूरत है।जिससे हम अतीत की परंपरा,पुरखों की विरासत और रामलीला मंचन की अनूठी पहचान को कायम रख सकें।



















