श्री कटरा रामलीला कमेटी में रावण के पुतले को नहीं जलाते

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डॉ०प्रदीप चित्रांशी

  प्रयागराज।  सोम,वरुण तथा प्रजापति की जन्मस्थली प्रयाग में पल्लवित होने वाली साहित्यिक,सांस्कृतिक एवं सामाजिक धारा  से निकलने वाली ज्ञान-गंगा,सदैव जिज्ञासुओं के अनुसंधान का केन्द्र  रही है। शहर में संगम तट पर प्रतिवर्ष माघ के महीने में माघ मेला, छ: और बारह वर्ष में लगने वाला अर्ध और पूर्ण कुम्भ हो या होली, दीपावली, दशहरा,ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व या कोई भी सामाजिक या राजनीतिक उत्सव हो, सभी यहाँ की भूमि की सोंधी महक में रचबस कर, मनोरंजन के अतिरिक्त, उर्जित ऊर्जा से समाज को दर्पण की  भाँति  संसार का मूल शोक देने वाले तत्व का दर्शन भी कराती हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में विजयदशमी के संदर्भ में गहराई से चिन्तन करने पर कई एक नए बिम्ब उभर कर सामने आते हैं। 
    विजयदशमी या दशहरा  आश्विन या कार्तिक मास  में  मनाए जाने वाले त्योहारों में एक प्रमुख त्योहार है। इस त्योहार का सम्बन्ध महिषासुर मर्दिनी शक्ति का अवतार  और सिंहवाहिनी देवी दुर्गा की विजय-गाथा, अन्य परा-प्रकृति  पर आधारित कहानियों के अलावा भगवान राम की जीवन-कथा संदर्भित है । राम-कथा के लिए महीनों पहले रामलीला  पूर्वाभ्यास के रूप में शुरु हो जाती है। फिर नौ दिनों तक लगातार  भगवान राम की सम्पूर्ण लीला छोटे-बड़े प्रत्येक स्तर पर प्रस्तुत की जाती है तथा शाम को राम की लीला और सामाजिक व्यवस्था पर आधारित झाँकियाँ निकलती हैं। दशमी के दिन रावण,कुम्भकर्ण और मेघनाथ के पुतले जलाकर, रावण पर राम की विजय का जश्न मनाते हैं।
        प्रयागराज में  रामलीला और झाँकियों का लगभग  दो सौ वर्ष से भी अधिक पुराना इतिहास है। अतीत में यहाँ पर पजावा रामलीला कमेटी,पथरचट्टी रामलीला कमेटी,दारागंज रामलीला कमेटी तथा श्री कटरा रामलीला कमेटी एवं इन सभी कमेटियों के रामदल शहर की अन्य रामलीला से ज्यादा सुसंगठित थीं। श्री कटरा रामलीला कमेटी को छोड़कर सभी रामलीला कमेटी  रावण-दहन  करती हैं। प्रयागराज की पावन भूमि पर श्री कटरा रामलीला में रावण-दहन क्यों नहीं होता, यह जानने के लिए इतिहास के कुछ पन्नों को पीछे पलटने की आवश्यकता पड़ेगी। श्री कटरा रामलीला कमेटी  जिस जगह पर रामलीला मंचन करती है, वह भरद्वाज आश्रम के करीब है। भरद्वाज आश्रम भरद्वाज मुनि की तपस्थली रही है। यहीं पर उनका परिवार भी रहता था। बेटी इलाविला  का बाल्यकाल अपने पिता भरद्वाज मुनि के साथ बीता। इलाविला के बड़ी होने पर भरद्वाज मुनि ने उसका विवाह रावण के पिता ॠषि विश्रवा से कर दिया जिनसे कुबेर का जन्म हुआ।  विश्रवा की दूसरी पत्नी कैकसी से रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण और सूर्पनखा पैदा हुए थे। रावण, कुबेर के सौतेले भाई होने के कारण भरद्वाज मुनि के रिश्ते में नाती हुए। भरद्वाज के कारण ही यहाँ के लोग रावण को नाती मानते हैं। इसी रिश्ते की मर्यादा का निर्वहन कर,रिश्ते की जीवन्तता को परिभाषित करते हुए तीनों लोकों के विजेता लंकाधिपति रावण की पूजा-अर्चना करते हैं तथा शोभा यात्रा निकालते हैं।इसमें हाथी,घोड़ा, बैण्ड बाजा,रोड लाइट के बीच रावण के साथ उनका कुनबा और मायावी सेना,  प्रयागराज की सड़कों पर निकलती है। रावण के स्वागत के लिए जन सैलाब सड़कों पर आ जाता है। नाती होने के कारण ही यहाँ के लोग रावण को जलाते नहीं हैं बल्कि रावण के पुतले को दारागंज रामलीला कमेटी को सौंप देते हैं।