डॉ०प्रदीप चित्रांशी
प्रयागराज।भारत की मूल संस्कृति ,गाँव के आँगन में पलती है जहाँ वृक्ष, नदी और पर्वत को पवित्र मानकर त्योहार मनाने की परम्परा आज भी विद्यमान है। यही परम्परा पर्यावरण- संरक्षण में महत्वपूर्ण तथा सकारात्मक भूमिका अदा कर,मानव और प्रकृति के बीच आत्मीय रिश्ता कायम करती है। रामायण, महाभारत, गीता और पुराणों आदिक धार्मिक ग्रंथों में पेड़-पौधों को संरक्षित करने के लिए नसीहतों के साथ उन्हें देवतुल्य भी बताया गया है। वेद में वृक्षों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि वृक्षों में देवता का वास होता है।
मूलतः ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णरूपिणें
अग्रत: शिवरूपाय वृक्षराजाए ते नम:।
अर्थात वृक्ष के मूल में ब्रह्मा,मध्य में विष्णु और शिरोभाग में शिव का वास होता है।
भारतीय संस्कृति में प्रकृति के विभिन्न अंगों को देवता तुल्य मानकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को आंवला के वृक्ष की पूजा का विधान है जो धार्मिक ग्रंथों और लोककथाओं में वर्णित है।
आंवला युफोरबिएसी परिवार का पौधा है। यह भारतीय मूल का एक महत्वपूर्ण फल है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। जैसे- हिन्दी में आंवला, संस्कृति में धात्विक या आमलकी, बांग्ला एवं उड़िया में अमला या मालकी, तमिल और मलयालम में नेल्लोर, तेलगु में अमलीजामा, गुरुमुखी में अमोल फल और अंग्रेजी में ऐप्लिकेशन,माइरोबालान या इंडियन गूजबेरी के नाम से जाना जाता है। अपने अद्वितीय औषधीय एवं पोषक गुणों के कारण भारतीय पौराणिक लोककथाओं में अद्भुत छटा बिखेरते हुए अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराते हुए दिखाई देते हैं।
आंवले की पूजा के पीछे पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। एक कहावत में जिस तरह आदिदेव शिवजी के आँसुओं से रुद्राक्ष की उत्पत्ति हुई उसी प्रकार ब्रह्मा जी के आँसुओं से आँवले के पेड़ की उत्पत्ति हुई है। कहा जाता है कि जब पूरी पृथ्वी जलमग्न हो गई थी तब ब्रह्मा जी के मन में सृष्टि दुबारा शुरू करने का विचार आया,विचार आते ही ब्रह्मा जी परब्रह्म की तपस्या करने लगे। ब्रह्मा जी की तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए जिन्हें देखकर ब्रह्मा जी रोने लगे और उनके आँसू भगवान विष्णु के चरणों पर गिरने लगे।ब्रह्मा जी के इन्हीं आँसुओं से आँवले के वृक्ष की उत्पत्ति हुई।
दूसरी कथा में कार्तिक के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर आँवले के वृक्ष की पूजा करने से माँ लक्ष्मी जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में कार्तिक के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर आँवले के वृक्ष के नीचे महादेव और भगवान विष्णु जी की पूजा की थी। उसी समय से इस तिथि पर आँवले के पूजन की परम्परा शुरू हो गई। पद्म पुराण के अनुसार अक्षय नवमी के दिन जो व्यक्ति व्रत व पूजन करते हैं वे सब पापों से मुक्त हो जाते हैं।
एक अन्य कथा के अनुसार चँदाला नाम का एक व्यक्ति जब फल तोड़ने के लिए पेड़ के ऊपर चढ़ रहा था,उसी समय उसका पैर फिसल गया।पेड़ से गिरते समय उसकी मौत हो गई। मृत्यु के पश्चात यमराज जी उसकी आत्मा लेने आए मगर नहीं ले जा सके क्योंकि मृत्यु से पूर्व उसने आँवले की पूजा की थी और प्रसाद ग्रहण किया था।
बौद्ध धर्म में इस फल से जुड़ी अत्यंत महत्वपूर्ण कथा के अनुसार यह फल अशोक द्वारा बौद्ध संघ को दिया गया अन्तिम उपहार है जिसका विवरण अशोकावदान में मिलता है । इसके अतिरिक्त कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। इन्हीं पौराणिक कथाओं की चर्चा करते हुए स्त्री और पुरुष नवमी के दिन आँवले के वृक्ष की पूजा करते हुए, वृक्ष के नीचे भोजन कर, अपने परिवार की संपन्नता के लिए मंगलकामना करते हैं।























