पाकिस्तान : UN विशेषज्ञों ने ईमान मज़ारी-हाज़िर और हादी अली चट्टा की तत्काल रिहाई की मांग की

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पाकिस्तान : UN विशेषज्ञों ने ईमान मज़ारी-हाज़िर और हादी अली चट्टा की तत्काल रिहाई की मांग की

इस्लामाबाद : संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने पाकिस्तान से मानवाधिकार वकील ईमान ज़ैनब मज़ारी-हाज़िर और हादी अली चट्टा को तत्काल रिहा करने और उनके खिलाफ लगाए गए आपराधिक तथा आतंकवाद से जुड़े आरोप वापस लेने की अपील की है। UN विशेषज्ञों ने दोनों की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ जारी कानूनी कार्रवाई पर चिंता जताई है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, 17 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के कुछ घंटों बाद दोनों को एक पुराने मामले में आतंकवाद से जुड़े आरोपों के तहत फिर गिरफ्तार कर लिया गया। यह मामला मार्च 2025 में हुए एक विरोध प्रदर्शन से संबंधित है, जिसे अधिकारियों ने अवैध बताया था।

UN विशेषज्ञों ने कहा कि वे पहले भी मज़ारी-हाज़िर और चट्टा के खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई को लेकर चिंता जता चुके हैं। दोनों वकील स्थानीय कार्यकर्ताओं का समर्थन करने और सेना की आलोचना से जुड़े सोशल मीडिया पोस्ट के मामलों में भी कानूनी कार्रवाई का सामना कर चुके हैं। UN की एक पूर्व संचार रिपोर्ट में दोनों के खिलाफ बार-बार मुकदमे, गिरफ्तारियों और धमकी-उत्पीड़न के आरोपों का उल्लेख किया गया था।

विशेषज्ञों ने कहा कि जमानत मिलने के तुरंत बाद पुराने मामले में दोबारा गिरफ्तारी से यह आशंका पैदा होती है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की वकालत करने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जनवरी से दोनों के खिलाफ चल रही कार्रवाई वकीलों को डराने और उनके पेशे पर दबाव बनाने का संदेश दे सकती है।

14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया

दोबारा गिरफ्तारी के बाद इस्लामाबाद की आतंकवाद-रोधी अदालत ने पुलिस की 30 दिन की हिरासत और पूछताछ की मांग को खारिज कर दिया। अदालत ने दोनों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। 22 सितंबर 2026 को आतंकवाद-रोधी अदालत ने दोनों की जमानत याचिकाएं लौटा दीं। अदालत ने कहा कि याचिकाओं के साथ हस्ताक्षरित ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ दस्तावेज संलग्न नहीं था।

आतंकवाद रोधी कानूनों के इस्तेमाल पर सवाल

UN विशेषज्ञों ने मानवाधिकारों की रक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के वैध इस्तेमाल को सीमित करने के लिए व्यापक और अस्पष्ट आतंकवाद-रोधी प्रावधानों के इस्तेमाल पर भी चिंता जताई। विशेषज्ञों ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत सरकारों को वकीलों को डराने-धमकाने, उत्पीड़न और अनुचित हस्तक्षेप से सुरक्षा देनी चाहिए। साथ ही, वकीलों को उनकी पेशेवर जिम्मेदारियां निभाने के कारण अनुचित मुकदमों या प्रशासनिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए।

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