चित्रकूट वैराग्य की जन्मस्थली है…….

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बुन्देलखण्ड क्षेत्र में स्थित चित्रकूट वह पावन धाम है जिसे प्रभु श्री राम ने अपनी तपस्थली बनाया, भगवान राम ने वनवास के 11 वर्ष चित्रकूट मे बिताए थे। चित्रकूट वैराग्य की जन्मस्थली है.. जहाँ भरत ने श्री राम की चरण पादुका को अपने मस्तक पर धारण करके अपने जीवन को सार्थक बनाया, जहाँ मंदाकिनी की अविरल धारा युगों-युगों से बह रही है और संतों-ज्ञानियों,ऋषियों-गंधर्वों, नर-नारियों के पापपुंजों का प्रक्षालन कर दिव्यता प्रदान कर रही है। चित्रकूट के पावन रामघाट पर गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने आराध्य का साकार दर्शन पाकर अपने जीवन को धन्य बनाया था।चित्रकूट का  बहुत अधिक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक महत्व है। भौगोलिक दृष्टि से चित्रकूट धाम, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश इन दोनों राज्यों के मध्य सतना ज़िले और उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले की सीमा पर स्थित है।प्रयागराज से सड़क मार्ग से लगभग 124 किमी की दूरी पर स्थित है। मुझे इस पावन स्थली के दर्शन करने का कई बार सौभाग्य मिला। चित्रकूट से थोड़ा पहले ही मुख्य मार्ग पर ही वाल्मीकि ऋषि का पावन आश्रम अपनी नैसर्गिक सुंदरता और आध्यात्मिकता का दर्शन कराता है।जहाँ सदैव भक्तों की भीड़ लगी रहती है। चित्रकूट धाम में अनेकों दर्शनीय स्थल हैं। जैसे- रामघाट, कामदगिरि पर्वत, सतीअुनसुइया आश्रम, गुप्त गोदावरी स्फटिक शिला, हनुमान धारा, राम शैय्या, जानकी कुंड, भरत कूप आदि। पूरे वर्ष अपार जन समूह इन तीर्थों के दर्शन हेतु आते रहते हैं।इसके अलावा अनेकों आश्रमों और ऋषियों-मुनियों की तप स्थलियों के भी यहाँ दर्शन होते हैं। 

कामदगिरि पर्वत 

मानव की समस्त कामनाओं को पूर्ण कराने वाले कामदगिरि पर्वत  का चित्रकूट में काफी धार्मिक महत्व है। श्रद्धालुजन कामदगिरि पर्वत की 5 किलोमीटर की परिक्रमा पूरी श्रद्धा के साथ करते हैं।चाँदनी रात में तो इस पर्वत की दिव्यता अद्भुत दिखलाई देती है।जंगलों से घिरे इस पर्वत के तल पर अनेक मंदिर बने हुए हैं जिनमें प्रमुख एवं लोकप्रिय कामतानाथ और भरत मिलाप मंदिर यहीं स्थित है।

रामघाट -चित्रकूट का सबसे लोकप्रिय दर्शनीय स्थल हैं जहाँ मंदाकिनी के तट पर सुंदर सजावट युक्त नौकाएँ हर तीर्थ यात्री का मन बरबस ही अपनी ओर खींच लेती हैं उनपर बैठकर नौका विहार करना अत्यंत आनंदित करने वाला अनुभव होता है। पुण्य मंदाकिनी में स्नान और पूजन कर हर तीर्थ यात्री अपने जीवन को सार्थक बनाता है।

सती अनुसुइया-अत्रि ऋषि आश्रम-इसकी पावनता और नैसर्गिक सुंदरता का वर्णन कर पाना शब्दातीत है।यहाँ की आध्यात्मिक शक्ति हर मनुष्य को पावन कर देती है कई जन्मों के जब पुण्य उदित होते हैं तभी कोई इस जगह आ पाता है। यह स्थान परम सौभाग्य प्रद है,जहाँ जनक नंदिनी सीता को माता अुनसुइया जी ने ज्ञान प्रदान किया और दिव्य वस्त्रों से अलंकृत किया था।

गुप्त गोदावरी-

चित्रकूट नगर से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर गुप्त गोदावरी का पावन तीर्थ स्थित हैं। यहाँ दो गुफाएँ हैं। एक गुफा चौड़ी और ऊँची है। प्रवेश द्वार पर लगे अभिलेख इसकी ऐतिहासिकता को प्रमाणित करते हैं। यह काफ़ी संकरा है जिस कारण इसमें आसानी से नहीं घुसा जा सकता। गुफा के अंत में एक छोटा तालाब है जिसे गोदावरी नदी कहा जाता है। दूसरी गुफा लंबी और संकरी है जिससे हमेशा पानी बहता रहता है। कई साल पहले जब मैं गुप्त गोदावरी का दर्शन करने गई थी तब छत की दीवार पर अनेकों चमगादड़ों को चिपके हुए देखा था जो बहुत अचंभित कर रहा था लेकिन अब वह स्थान चमगादड़ों से मुक्त हो चुका है।ऐसी मान्यता है कि दक्षिण की गोदावरी नदी की एक धारा रामचंद्र जी की सेवा हेतु यहाँ गुप्त रूप से प्रकट हुई थी जो गंगा के समान पुण्यदाई है। यहाँ राम- लक्ष्मण जी ने कुछ समय तक निवास किया था।

भरत कूप- माता-पिता की आज्ञानुसार जब रामचंद्र जी ने वनवास के लिए चित्रकूट को अपना निवास स्थान बनाया तो भरत जी रामचंद्र को मनाने के लिए पूरे परिवार के साथ यहाँ आए थे, लेकिन रामचंद्र जी ने अपने आदर्श को नहीं त्यागा और भरत जी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। भरत जी राम के राज्याभिषेक के लिए समस्त पवित्र तीर्थों का जल साथ में लेकर आए थे लेकिन राम की दृढ़ प्रतिज्ञा के कारण उनके मन को ठेस लगी। भरत जी ने समस्त तीर्थों के पवित्र जल को एक कूप में विसर्जित कर दिया जिसे आज  भरत कूप के नाम से जाना जाता है उसके पास एक राम मंदिर भी स्थापित है। 

स्फटिक शिला- यह वह पवित्र शिला है जिसपर राम जी सीता जी के साथ बैठकर चित्रकूट की सुंदरता को देखते थे। एक बार इंद्र के पुत्र जयंत ने कौए का रूप धरकर सीताजी को स्पर्श करने का प्रयास किया था जिसका उसे दंड भुगतना पड़ा था।

जानकी कुंड- जनक नंदिनी जी अपने स्नान के लिए जनक कुंड का प्रयोग करती थीं जिसका बहुत महत्व है। इस कुंड के समीप राम मंदिर और संकट- मोचन मंदिर स्थापित हैं। 

हनुमान धारा- ऐसी मान्यता है कि जब हनुमान जी ने लंका नगरी का दहन किया था उसके पश्चात हनुमान जी का शरीर अत्यधिक पीड़ा का अनुभव कर रहा था उनके शारीरिक ताप को मिटाने के लिए चित्रकूट में हनुमान धारा प्रकट हुई थी जिसके जल से हनुमान जी को शांति मिली थी। यह अत्यंत मनोरम और ऊँचाई पर स्थित दिव्य तीर्थस्थल है। यहाँ की जल-धारा हर भक्त के ह्रदय आनंदित करती है। यहाँ पर हनुमान जी का भव्य मंदिर भी है।

राम शैय्या-

चित्रकूट से 10 किमी की दूरी पर स्थित 

राम-शैय्या एक बड़ी सी शिला  है। इस पर भगवान राम और माता सीता के पद चिन्ह अंकित है। बताया जाता है कि जिस स्थान पर माता सीता और भगवान श्री राम विश्राम किया करते थे उनके बीच में एक धनुष रखा रहता था उनके भी चिन्ह यहाँ अंकित है।यह बहुत पवित्र स्थल है। इस पवित्र स्थल पर कलियुग में, शिव जी ने जब द्वादश भागवत के रूप में स्वामी रामानन्द जी से दीक्षा प्राप्त की और सुखानंद नाम से विख्यात हुए थे,  तब गुरु के आदेश पर चित्रकूट आकर राम शैय्या के पवित्र स्थान पर अपना आसन जमाया और अनेकों साधु संतों को अपनी कृपा दृष्टि से कृतकृत्य किया था ।आज भी लोग यहां आकर इस राम-शैय्या का दर्शन कर पुण्यभागी बनते हैं ।

चित्रकूट का सौन्दर्य और इसकी महिमा अनंत है। यहाँ का कण-कण राममय है, प्रतिवर्ष यहाँ संतों का समागम और रामायण मेला का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक अमावस्या को लाखों लोग चित्रकूट का दर्शन करने आते हैं।रामनवमी पर्व में बहुत बड़ा उत्सव होता है। राम जी ने दण्डकारण्य  के कोल- भील-किरात, ग्रामीणों-नागरिकों, वन्यजीवों को अपनी कृपा का प्रसाद प्रदान किया था ।चित्रकूट प्रभु की लीला का परम धाम है। रघुनाथ जी की निश्छल भक्ति रूपी पयस्विनी में अवगाहन कर आज भी भक्त चित्रकूट का दर्शन कर आनन्दित होते हैं मनोवांछित फलदायक कल्पतरु के समान चित्रकूट भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला एक अनोखा तीर्थ स्थल है।यहाँ की दिव्यता का  जिसने भी दर्शन कर लिया उसका मानव  जन्म लेना  सफल हो जाता है।प्रभु के चरणों में नतमस्तक होकर यही प्रार्थना करती हूँ —-

“रघुकुल नायक श्री राम प्रभु तुम कृपा करो मैं शरणागत।”

जय कामतानाथ!

जय जय श्री रघुनाथ!

प्रयागराज 

8127713641