Shahar Samta News
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम टूटने के बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष एक बार फिर तेज हो गया है। लगातार हो रहे हमलों के बीच अब ईरान का कुंभकरण जाग गया है और उसने ऐसा दांव चलने की तैयारी कर ली है जिससे पूरी दुनिया में हाहाकार मच जाएगी। अगर ईरान ने यह पासा फैंक दिया तो तेल और गैस की आपूर्ति पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने यमन के हूती विद्रोहियों को संकेत दिया है कि अगर अमेरिका ने उसके तेल संयंत्रों और अन्य महत्वपूर्ण ऊर्जा ढांचे पर बड़े हमले किए तो वे लाल सागर (Red Sea) के रणनीतिक बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य (Bab el-Mandeb Strait) को बंद कर सकते हैं।
होर्मुज के बाद अब बाब-अल-मंदेब भी निशाने पर
दुनिया के लिए पहले से ही होर्मुज जलडमरूमध्य बेहद अहम समुद्री मार्ग है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की आपूर्ति होती है। यदि बाब-अल-मंदेब भी बंद हो जाता है तो मध्य पूर्व से यूरोप, एशिया और अफ्रीका तक तेल व गैस की सप्लाई गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। इससे वैश्विक ऊर्जा संकट और महंगाई दोनों बढ़ने की आशंका है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, हूती संगठन से जुड़े सूत्रों का कहना है कि बाब-अल-मंदेब के आसपास मिसाइलों और ड्रोन की तैनाती कर दी गई है। विद्रोही अब केवल अंतिम आदेश का इंतजार कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) यह तय करेगी कि जलडमरूमध्य को कब और किस तरह बंद किया जाए।
तेल आपूर्ति पर पड़ेगा बड़ा असर
जहाजों की निगरानी करने वाली संस्था Kpler के अनुसार जून महीने में बाब-अल-मंदेब से प्रतिदिन लगभग 74 लाख बैरल कच्चा तेल गुजरा, जो वैश्विक उत्पादन का करीब 7 प्रतिशत है। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा लगभग 42 लाख बैरल प्रतिदिन था। होर्मुज में बढ़ते खतरे के कारण हाल के महीनों में इस मार्ग का महत्व और बढ़ गया है। खतरे को देखते हुए सऊदी अरब ने अपनी बड़ी तेल खेपों को लाल सागर स्थित यानबू बंदरगाह के जरिए भेजना शुरू कर दिया है। साथ ही वह लाल सागर तक कच्चा तेल पहुंचाने वाली पाइपलाइन की क्षमता बढ़ाने पर भी विचार कर रहा है। ऐसे में यदि बाब-अल-मंदेब भी बंद हो जाता है तो खाड़ी क्षेत्र के दोनों प्रमुख समुद्री मार्ग प्रभावित हो जाएंगे।
भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
इस संकट का असर भारत पर भी पड़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। खाड़ी देशों से आने वाला तेल मुख्य रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य से आता है, जबकि रूस से आने वाला यूराल्स कच्चा तेल स्वेज नहर और बाब-अल-मंदेब के रास्ते भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचता है। यदि दोनों मार्ग बाधित होते हैं तो भारत में तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, शिपिंग लागत बढ़ सकती है और पेट्रोल-डीजल समेत ऊर्जा की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष और बढ़ता है तथा दोनों प्रमुख समुद्री मार्गों पर आवाजाही बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। इसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा और ऊर्जा संकट पहले से कहीं अधिक गंभीर हो सकता है।

























