भारत से रूस और यूरोप तक व्यापार को आसान बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। ईरान ने इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के तहत बनने वाली 162 किलोमीटर लंबी रश्त-अस्तारा रेलवे लाइन के पूरे निर्धारित मार्ग की जमीन रूसी पक्ष को सौंप दी है। इसके साथ ही इस परियोजना के लिए इंजीनियरिंग सर्वेक्षण और अन्य शुरुआती तकनीकी कार्यों का रास्ता साफ हो गया है। ईरान के शहरी विकास उप मंत्री और परिवहन अवसंरचना निर्माण एवं विकास कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी होशंग बाजवंद ने बताया कि उत्तरी प्रांत गिलान में रेलवे लाइन के शेष 37 किलोमीटर हिस्से की जमीन भी रूस को सौंप दी गई है। इससे पहले फरवरी में 125 किलोमीटर हिस्से की जमीन रूसी पक्ष को दी गई थी। ईरानी सरकार ने इस परियोजना के लिए 55 हेक्टेयर से अधिक जमीन का अधिग्रहण किया है।
इस परियोजना को लेकर रूस और ईरान के बीच उच्चस्तरीय बातचीत भी हुई है। छह नवंबर को मॉस्को में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसेन रेजाई से मुलाकात की। इस दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा, अमेरिका-ईरान तनाव और दोनों देशों के बीच सहयोग सहित कई मुद्दों पर चर्चा हुई। रूस और ईरान ने रेलवे परियोजना के पूरे मार्ग पर तकनीकी सर्वेक्षण के लिए जमीन तक पहुंच से जुड़े दस्तावेजों पर भी हस्ताक्षर किए हैं। रूस के उप प्रधानमंत्री आंद्रेई निकितिन के अनुसार, रूसी कंपनी कैस्पियन सर्विसेज और ईरान की परिवहन अवसंरचना निर्माण एवं विकास कंपनी ने पूरे मार्ग पर इंजीनियरिंग सर्वेक्षण के लिए जमीन तक पहुंच देने संबंधी समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। फिलहाल रूसी विशेषज्ञ भूवैज्ञानिक, स्थलाकृतिक और मौसम संबंधी सर्वेक्षण कर रहे हैं।
टरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर भारत, ईरान, रूस और अन्य देशों को जोड़ने वाला बहुआयामी परिवहन गलियारा है। इसका उद्देश्य भारत और दक्षिण एशिया को ईरान, कैस्पियन सागर क्षेत्र और रूस के रास्ते उत्तरी यूरोप के बाजारों से जोड़ना है। भारत के लिए यह गलियारा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके जरिये सामान को समुद्री रास्ते से स्वेज नहर होते हुए यूरोप भेजने के बजाय सड़क, रेल और समुद्री मार्गों के मिले-जुले नेटवर्क से पहुंचाया जा सकता है।रश्त-अस्तारा रेलवे लाइन इस गलियारे की पश्चिमी शाखा का सबसे महत्वपूर्ण अधूरा हिस्सा है। यह ईरान के रश्त शहर को अजरबैजान की सीमा के पास स्थित अस्तारा से जोड़ेगी। आगे अजरबैजान का रेल नेटवर्क रूस से जुड़ता है। इस तरह भारत से ईरान होते हुए रूस और यूरोप तक माल ढुलाई के लिए अधिक सीधा संपर्क तैयार हो सकेगा।
इस परियोजना का सबसे बड़ा संभावित फायदा माल ढुलाई में लगने वाले समय और लागत में कमी है। इस गलियारे के जरिये भारत से यूरोप तक सामान पहुंचाने में करीब 20 से 25 दिन लगने का अनुमान जताया जा रहा है। इसकी तुलना में स्वेज नहर के रास्ते समुद्री परिवहन में अधिक समय लग सकता है। हालांकि, 20 से 25 दिनों का समय एक अनुमान है। वास्तविक अवधि रेल संपर्क पूरा होने, सीमा शुल्क प्रक्रियाओं, बंदरगाहों और अलग-अलग देशों के परिवहन नेटवर्क पर निर्भर करेगी। 162 किलोमीटर लंबी इस रेलवे परियोजना के तहत आठ नए रेलवे स्टेशन, 56 पुलनुमा ऊंचे मार्ग, 73 पुल और 30 अन्य ऊपरी मार्ग बनाए जाने की योजना है। इसके निर्माण से ईरान और रूस के रेल नेटवर्क के बीच सीधा संपर्क स्थापित होगा। इस परियोजना को पूरा करने में अभी समय लगेगा। फिलहाल जमीन हस्तांतरण के बाद तकनीकी सर्वेक्षण और प्रारंभिक तैयारियां चल रही हैं। रूस और ईरान के बीच निर्माण कार्य शुरू करने और उसे पूरा करने की अंतिम समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं है।






















