बनारस: ठाट-बाट और घाट

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वाराणसी से राजेश ओझा ‘धर्मशील’

बनारस अपने घाटों के कारण विश्व विख्यात तो है ही, लेकिन बनारसियों की ठाट-बाट और ठसक इस शहर को तीनों लोकों से न्यारी बनाती है। वर्ष 2001 में जब बनारस पढ़ने आया तो जिस जगह से सबसे पहले परिचय हुआ, वो थी – ‘पीएमसी’। इस संक्षिप्ताक्षर वाली जगह के बारे में जानने की तीव्र जिज्ञासा पैदा हुई। मुझे लगा कि शायद डीएलडब्ल्यू – डीजल लोकोमोटिव्स वर्क्स की तरह ही इस जगह का भी कोई भारी-भरकम अंग्रेजी नाम होगा। लेकिन रैगिंग में सीनियरों ने मेरी धारणा को गलत साबित करते हुए मेरा ज्ञानवर्धन किया और बताया कि इसका फुल फॉर्म – ‘पिया मिलन चौराहा’ होता है, बचवा। खैर, और जिस दूसरी सबसे फेवरिट (उस उम्र एवं वय के अनुसार) जगह के बारे में जाना, वो था – अस्सी घाट। बनारस का एक रमणीय घाट। तब मैंने अनुमान लगाया कि इससे पहले बनारस के उन्नासी घाट बन चुके होंगे तभी तो इसका नाम अस्सी घाट रखा गया है। और मन में बिठा लिया कि बनारस में कुल अस्सी (80) घाट हैं। लेकिन आज वाराणसी नगर निगम की वेबसाइट से पता चला कि बनारस में अभी कुल अट्ठासी (88) घाट हैं।

गोमुख से गंगासागर तक गंगा की यात्रा में केवल बनारस ही ऐसी जगह है जहाँ गंगा उत्तरवाहिनी हैं। यहाँ इनका आकार अर्द्ध चंद्र जैसा है। आकाश से देखने पर ऐसा लगता है मानो काशी विश्वनाथ के मस्तक पर गंगा चंद्र रूप में शोभायमान हों और यहाँ के घाट मुकुट रूप में सुशोभित। यूँ तो काशी में लगभग अस्सी घाट से लेकर आदिकेशव घाट तक अट्ठासी घाटों को स्पर्श करती हुई बहने वाली गंगा की जलधारा एक ही है लेकिन गंगा की लहरें बनारस के घाटों के साथ कल्लोल करती हुईं हर एक घाट को एक विशिष्ट पहचान देती हैं।

ठाट-बाट हर घाट-घाट में, घोटम-घोट छना रस है।
कहो उसको कौन बनायेगा, जो खुद से खुद बना रस है।। (पाण्डेय चिदानंद ‘चिद्रुप’)

गंगा की लहरों की तरह इसके घाट भी अनुपम हैं। बनारस में गंगा किनारे बने अट्ठासी प्रमुख घाटों में हर एक की अलग कहानी और पहचान है। हर घाट ऐतिहासिक है और अपने आप में मानो एक पूरा युग समाहित किए होता है। यहां संस्कृतियों के बीच बहस और विवाद नहीं बल्कि अपनी अपनी अलग पहचान के साथ जीने और परंपराओं के निर्वहन की कड़ियां आज भी पुरा काल से जीवंत हैं। घाटों का महत्व व महात्म्य काशी के वैभव से जुड़ा हुआ है। सीढ़ी, सांड़ और संन्यासी की परंपरा में काशी का गंगा तट अनुपम और अविस्मरणीय सा प्रतीत होता है। यहां पर घाटों की बनावट और बसावट के साथ चुनार के पिंक पत्थरों से बने घाटों की सुंदरता देखते बनती है।

भारतीय समाज में ज्येष्ठ ही श्रेष्ठ पद का अधिकारी होता है। ज्येष्ठ का अर्थ कि उम्र में बड़ा। इस धरती पर काशी से अधिक पुरानी कोई नगरी नहीं है। इस सृष्टि के सृजन के पहले से महादेव इस काशी पुरी को अपने त्रिशूल पर लिये घुमते थे और जब सृष्टि की उत्पत्ति हुई तो इसे रख दिया। तो उम्र के लिहाज से भी काशी सबसे बड़ी हुई न? लोगों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि यह कैसा तर्क है? ऐसे कैसे मान लें? खाता न बही, हम कहें वही सही। यह नहीं चलेगा। कोई बात नहीं। आप मेरा बात न मानिए। दूसरे की बात मानेंगे न? और वह दूसरा किसी अन्य देश का हो तो उसकी बात तो सरलता से मान लेंगे। तो यह भी देख लें कि अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप की 2 महीनों की यात्राओं से Following the Equator (1897) किताब लिखी, बनारस के बारे में लिखते हैं ‘Benares is older than history, older than tradition, older even than legend, and looks twice as old as all of them put together’, अर्थात्‌- बनारस इतिहास से भी पुराना है, परंपराओँ से भी प्राचीन है। किवदंतियों से भी पुरातन है और अगर हम इन सबको जोड़ दें तो उनसे भी दोगुना प्राचीन है।’

तो बनारस ज्येष्ठ भी है और श्रेष्ठ भी। अब श्रेष्ठता की अपनी एक खास ठसक और ठाट-बाट होती है, जो बनारस और बनारसियों में दिखता है। बनारसियों के ठाट-बाट का केवल यही एक कारण नहीं है। यह विश्वेश्वर महादेव की नगरी है और महादेव से इनका आपसी गुरू-चेला जैसा रिश्ता है। भगवान शिव से ये बोलते-बतियाते हैं। विश्वास न हो तो कभी शयन आरती में बनारसियों का यह रूप देखा जा सकता है। अब जो उम्र में भी बड़ा है और जिसका विश्वेश्वर (विश्व के ईश्वर) के साथ इतना निकट संबंध भी है, ठाट-बाट उसकी नहीं होगी तो किसकी होगी?

“ख़ाक भी जिस जमी की पारस है,
शहर मशहूर यह बनारस है।”

(डी 59/365 केएसडी, जय प्रकाश नगर, सिगरा, वाराणसी, मो. – 8527536548)