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ओड़िशा के तट पर स्थित जगन्नाथ पुरी सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था और अनसुलझे रहस्यों का एक ऐसा संगम है जिसे सदियों से कोई भी तर्क काट नहीं पाया है। यहां भगवान श्रीकृष्ण ‘जगन्नाथ’ के रूप में अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। नीम की लकड़ी से बने इनके ‘अधूरे’ विग्रहों के पीछे जितनी भावुक कथा है, उससे कहीं ज्यादा हैरान करने वाले यहाँ के भौतिक नियम हैं, जो आधुनिक विज्ञान को भी चुनौती देते हैं।
भगवान जगन्नाथ, उनकी दिव्य व अलौकिक छवि और उनके रथों का वर्णन स्कंद और ब्रह्म पुराण में मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य अवतार के रूप में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भैया बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथपुरी धाम में विराजते हैं जहां आषाढ़ मास में प्रति वर्ष रथयात्रा का आयोजन होता है। यह परम्परा सदियों से यूं ही चली आ रही है।
जगन्नाथ मंदिर में स्थापित मूर्तियां अन्य हिन्दू मंदिरों की तरह पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि नीम की लकड़ी (दारु) से बनी हैं और ये अधूरी हैं। इनके हाथ-पैर नहीं हैं। इसके पीछे एक बेहद भावुक पौराणिक कथा है।
नीलांचल पर्वत के मनमोहक रूप वाले स्थान पर मालवा के राजा इंद्रधुम्न को स्वप्न में प्रभु की इस छवि के दर्शन हुए। तदोपरांत राजा ने समुद्र तट पर कठोर तप किया और भगवान विष्णु ने उन्हें समुद्र से लकड़ी का एक दिव्य लट्ठा तैरता हुआ मिलने का स्वप्न दिया। उस लकड़ी के प्राप्त होने पर उससे भगवान के विग्रहों का निर्माण करना था परंतु कोई शिल्पी नहीं मिला।
प्रभु की इस लीला को साकार करने के लिए देव शिल्पी बाबा विश्वकर्मा एक बूढ़े शिल्पकार के रूप में प्रकट हुए और कहा कि एक बंद स्थान में 21 दिवसों में इनका निर्माण होगा और यदि कोई इस दौरान भीतर आ गया तो कार्य बीच में ही छोड़ देंगे।
जब 15 दिन गुजर गए और भीतर से निर्माण कार्य की आवाजें न आईं तो राजा इंद्रधुम्न की पत्नी रानी गुंडिया व्याकुल हो गई। रानी को चिंता हुई कि वृद्ध मूर्तिकार भूख-प्यास से मर न गया हो। राजा ने रानी के कहने पर दरवाजा खुलवा दिया। ऐसा करते ही विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए और तीनों विग्रह बिना हाथ-पैर के अधूरे निर्मित मिले। तब आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में धरती पर रहना चाहते हैं और उन्हीं रूपों में उन्हें स्थापित कर दिया गया।
इसके बाद नगर परिक्रमा के लिए इन्हें रथों पर विराजमान किया गया जिससे इस ऐतिहासिक और पौराणिक भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की पवित्र पावन और भव्य रथयात्रा का सूत्रपात हुआ।
प्रतिवर्ष दिव्य छवि निहारने के लिए लाखों की भीड़ जुटती है और सारा जगन्नाथपुरी धाम जय जगन्नाथ, जय बलदेव और जय देवी सुभद्रा के जयकारों से गूंज उठता है।
तीन रथों पर अलग-अलग विराजमान होकर रथयात्रा नगर परिक्रमा करती है। भगवान जगन्नाथ का रथ ‘नंदीघोष’, भगवान बलभद्र का रथ ‘तालध्वज’ और देवी सुभद्रा का रथ ‘दर्पदलन’ कहलाता है। रथों पर सवार प्रभु के दिव्य और अलौकिक रूप ऐसी अद्भुत छटा बिखेरते हैं कि भक्तजन मंत्रमुग्ध होकर आत्मविभोर हो जाते हैं तथा जयकारों से समूचे गगन को भी गुंजायमान कर देते हैं।
भारत वर्ष में अन्य स्थानों पर भी प्रतिवर्ष रथयात्राएं निकाली जाती हैं जोकि सामाजिक और धार्मिक सद्भाव और परस्पर एकता की उदाहरण हैं जो प्रभु की असीम कृपा और अनुकंपा सहजता से प्राप्त करने का साधन है तथा भक्तजन बड़े चाव से आनंदित होकर मधुर हरिनाम संकीर्तन करते हुए मोटे जूट के रस्सों से इन रथों को खींचते हैं।
पुराणों में वर्णन है कि श्रद्धा व भक्ति भावना से इनको छूने मात्र से ही जन्म-जन्मांतर के कष्ट कटते हैं और रथयात्रा में रथों को खींचकर प्रेम भाव से प्रभु नाम संकीर्तन से भगवद् धाम की प्राप्ति होती है।
मंदिर के शिखर पर हवा के विपरीत लहराता ध्वज
यह एक ऐसा भौतिक विज्ञान का नियम है जिसे जगन्नाथ मंदिर पूरी तरह चुनौती देता है। आमतौर पर हवा जिस दिशा में चलती है, कपड़ा या झंडा उसी दिशा में लहराता है। जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगा लाल रंग का ध्वज हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है। ऐसा क्यों होता है, इसका रहस्य आज तक कोई नहीं जान पाया।
इस 45 मंजिला ऊंची इमारत के शिखर पर स्थित ध्वज को हर दिन एक पुजारी बिना किसी सुरक्षा उपकरण के उल्टा चढ़कर बदलता है। मान्यता है कि अगर एक दिन भी ध्वज नहीं बदला गया, तो मंदिर अगले 18 सालों के लिए बंद हो जाएगा।
सुदर्शन चक्र की अनोखी बनावट
मंदिर के शिखर पर अष्टधातु से बना एक भव्य सुदर्शन चक्र स्थापित है, जिसे नीलचक्र भी कहा जाता है। आप पुरी के किसी भी कोने में खड़े होकर इस चक्र को देखेंगे, तो इसका मुख हमेशा आपकी तरफ ही दिखाई देगा। इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि हर दिशा से यह आपके सामने नजर आता है।
























